आयुर्वेदिक दवा के फायदे और महत्व

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OCTOBER 3, 2020

Benefits and importance of ayurveda

what is ayurvedic dava? and how can it help you boost your immunity

आयुर्वेद क्या हैं?

 

आयुर्वेद हमें हजारों वर्षों से स्वस्थ जीवन का मार्ग दिखा रहा है। प्राचीन भारत में आयुर्वेद को रोगों के उपचार और स्वस्थ जीवन शैली व्यतीत करने का सर्वोत्तम तरीकों में से एक माना जाता था। अच्छे स्वास्थ्य को बनाए रखने के महत्व के कारण, हमने आधुनिक विश्व में भी आयुर्वेद के सिद्धांतों और अवधारणाओं का उपयोग करना नहीं छोड़ा - यह है आयुर्वेद का महत्व।

 

आयुर्वेद का महत्व

 

आयुर्वेद पांच हजार साल पुरानी चिकित्सा पद्धति है, जो हमारी आधुनिक जीवन शैली को सही दिशा देने और स्वास्थ्य के लिए लाभकारी आदतें विकसित करने में सहायक होती है। इसमें जड़ी बूटि सहित अन्य प्राकृतिक चीजों से उत्पाद, दवा और रोजमर्रा के जीवन में इस्तेमाल होने वाले पदार्थ तैयार किए जाते हैं। इनके इस्तेमाल से जीवन सुखी, तनाव मुक्त और रोग मुक्त बनता है। बीते 75 साल से 'केरल आयुर्वेद' भी आयुर्वेद पर आधारित सामान उप्लब्ध करा लोगों के जीवन को सुगम बनाने का काम कर रहा है। 

कंपनी की वेबसाइट भी है, जहां आप ऐसे उत्पाद आसानी से पा सकते हैं, जिन्हें पूर्ण रूप से प्राकृतिक उत्पादों से बनाया जाता है। आयुर्वेद को 1976 में विश्व स्वास्थ्य संगठन ने भी आधिकारिक तौर पर मान्यता दी है। ये उप्चार पद्धति बीमारियों पर काम करती है, त्वचा एवं बालों को स्वस्थ बनाती है और मानव शरीर एवं मस्तिष्क को फायदा पहुंचाती है। आयुर्वेद का अभिप्राय केवल जप, योग, उबटन लगाना या तेल की मालिश करना ही नहीं है, बल्कि आयुर्वेद का महत्व इससे भी व्यापक है। आयुर्वेद में किसी भी तरह की स्वास्थ्य समस्या के मूल कारण का पता लगाकर उसे खत्म करने पर काम किया जाता है। यही कारण है कि भारत के अलावा आज दुनियाभर में आयुर्वेद को काफी ऊंचा स्थान दिया गया है। 

 

आयुर्वेद का इतिहास

आयुर्वेद एक प्राचीन चिकित्सा विज्ञान है जो कम से कम 5,000 वर्षों से भारत में प्रचलित है। यह शब्द संस्कृत के शब्द अयुर (जीवन) और वेद (ज्ञान) से आया है। आयुर्वेद, या आयुर्वेदिक चिकित्सा को कई सदियों पहले ही वेदों और पुराणों में प्रलेखित किया गया था। यह बात और हैं के आयुर्वेद वर्षों से विकसित हुआ है और अब योग सहित अन्य पारंपरिक प्रथाओं के साथ एकीकृत है।

आयुर्वेद की खोज भारत में ही हुई थी और भारतीय उपमहाद्वीप में व्यापक रूप से आयुर्वेद का अभ्यास किया जाता है - 90 प्रतिशत से अधिक भारतीय आयुर्वेदिक चिकित्सा के किसी न किसी रूप का उपयोग करते हैं। यूनिवर्सिटी ऑफ मिनेसोटा (University of Minnesota) के सेंटर फॉर स्पिरिचुअलिटी एंड हीलिंग (Center for Spirituality and Healing) के अनुसार इस परंपरा को पश्चिमी दुनिया में पिछले कुछ सालों में बहुत लोकप्रियता प्राप्त हुई है, हालांकि अभी भी आयुर्वेद उपचार को वैकल्पिक चिकित्सा उपचार माना नहीं जाता है।

 

 

आयुर्वेद कैसे काम करता है - क्या है तीन दोष?
 

आयुर्वेद में त्रिदोष - वात-पित्त-कफ का महत्व और इनका हमारे स्वास्थ्य से संबंध:

आयुर्वेद तीन मूल प्रकार के ऊर्जा या कार्यात्मक सिद्धांतों की पहचान करता है जो हर किसी इंसान और हर चीज में मौजूद हैं। इसे त्रिदोष सिद्धांत कहते है।  जब ये तीनों दोष - वात, पित्त और कफ  (Vata, pitta, kapha) संतुलित रहते हैं तो शरीर स्वस्थ रहता है। आयुर्वेद के सिद्धांत शरीर के मूल जीव विज्ञान से संबंधित हो सकते हैं। आयुर्वेद में, शरीर, मन और चेतना संतुलन बनाए रखने में एक साथ काम करते हैं। शरीर, मन और चेतना की असंतुलित अवस्था (vikruti) विकृति कहा जाता है। आयुर्वेद स्वास्थ्य लाता है और दोषों को संतुलन में रखता है। कुल मिलाकर, इसका उद्देश्य सामान्य स्वास्थ्य को बनाए रखना और बेहतर बनाना है, चाहे आप किसी भी उम्र के हों।

 

  1. आयुर्वेदिक दर्शन के अनुसार हमारा शरीर पांच तत्वों (जल, पृथ्वी, आकाश, अग्नि और वायु) से मिलकर बना है। वात, पित्त और कफ इन पांच तत्वों के संयोजन और क्रमपरिवर्तन हैं जो सभी निर्माण में मौजूद पैटर्न के रूप में प्रकट होते हैं।
     

  2. भौतिक शरीर में, वात आंदोलन की सूक्ष्म ऊर्जा है, पाचन और चयापचय की ऊर्जा, और शरीर की संरचना बनाने वाली ऊर्जा को साफ करती है। वात गति से जुड़ी सूक्ष्म ऊर्जा है - जो अंतरिक्ष और वायु से बनी है। यह श्वास, निमिष, मांसपेशियों और ऊतक आंदोलन, हृदय की धड़कन और साइटोप्लाज्म और कोशिका झिल्ली में सभी आंदोलनों को नियंत्रित करता है। संतुलन में, वात रचनात्मकता और लचीलेपन को बढ़ावा देता है। संतुलन न होने से, वात भय और चिंता पैदा करता है।
     

  3. पित्त शरीर की चयापचय प्रणाली के रूप में व्यक्त करता है - आग और पानी से बना है। यह पाचन, अवशोषण, आत्मसात, पोषण, चयापचय और शरीर के तापमान को नियंत्रित करता है। संतुलन में, पित्त समझ और बुद्धि को बढ़ावा देता है। संतुलन न होने से, पित्त क्रोध, घृणा और ईर्ष्या पैदा करता है।

    कफ  वह ऊर्जा है जो शरीर की संरचना - हड्डियों, मांसपेशियों, टेंडन - का निर्माण करती है और "गोंद" प्रदान करती है जो कोशिकाओं को एक साथ रखती है, जो पृथ्वी और जल से मिलकर बनती है। यह जोड़ों को चिकनाई देता है, त्वचा को मॉइस्चराइज़ करता है, और प्रतिरक्षा को बनाए रखता है। संतुलन में, कफ को प्यार, शांति और क्षमा के रूप में व्यक्त किया जाता है। संतुलन से बाहर, यह लगाव, लालच और ईर्ष्या की ओर जाता है।

 

आयुर्वेद के स्वास्थ्य लाभ:
 

1. स्वस्थ वजन, त्वचा और बाल का रखरखाव

एक स्वस्थ आहार और आयुर्वेदिक इलाजों के माध्यम से जीवनशैली में संशोधन करके शरीर से अतिरिक्त चर्बी को कम करने में मदद मिलती है। आयुर्वेद खान-पान में सुधार लाकर एक स्वस्थ वजन को मेन्टेन करने में मदद करता है। ऑर्गेनिक और प्राकृतिक तरीकों से आप स्वस्थ त्वचा पा सकते है।  सिर्फ यही नही, संतुलित भोजन, टोनिंग व्यायाम और आयुर्वेदिक पूरक / सप्लीमेंट के मदद से न केवल आपका शरीर स्वस्थ रहेगा बल्कि मन भी प्रसन्न रहेग।

2. आयुर्वेदिक इलाज आपको तनाव से बचने में मदद करता हैं।

योग, मेडिटेशन, ब्रीदिंग एक्सरसाइज, मसाज और हर्बल उपचारों का नियमित अभ्यास शरीर को शांत, डिटॉक्सिफाई और कायाकल्प करने में मदद करता है। ब्रीदिंग एक्सरसाइज शरीर पर सक्रमण को बनाए रखते हैं और कोशिकाओं में अधिक मात्रा में ऑक्सीजन की आपूर्ति करता है। अवसाद और चिंता को दूर रखने के लिए आयुर्वेद में शिरोधारा, अभ्यंगम, शिरोभ्यंगम, और पद्यभंगम जैसे व्यायामों की सलाह दिया जाता है।

3. जलन और सूजन में मदद करें:

उचित आहार की कमी, अस्वास्थ्यकर भोजन दिनचर्या, अपर्याप्त नींद, अनियमित नींद पैटर्न और खराब पाचन से सूजन हो सकती है। न्यूरोलॉजिकल रोगों, कैंसर, मधुमेह, हृदय संबंधी समस्याओं, फुफ्फुसीय रोगों, गठिया, और कई अन्य रोगों का मूल कारण सूजन से शुरू होता है। जैसे-जैसे आप अपने दोष के अनुसार खाना शुरू करते हैं, पाचन तंत्र मजबूत होने लगता है। सही समय पर कुछ खाद्य पदार्थों का सेवन रक्त और पाचन तंत्र में विषाक्त पदार्थों को कम करता है। जिससे जीवन शक्ति और उच्च ऊर्जा प्राप्त होता है और साथ ही साथ मूड स्विंग्स और सुस्ती को कम करने में मदद करता है।

4. शरीर का शुद्धिकरण:

आयुर्वेद में पंचकर्म में एनीमा, तेल मालिश, रक्त देना, शुद्धिकरण और अन्य मौखिक प्रशासन के माध्यम से शारीरिक विषाक्त पदार्थों को समाप्त करने का अभ्यास है। आयुर्वेदिक हर्बल दवाओं में बड़े पैमाने पर उपयोग किए जाने वाले उपयुक्त घरेलू उपचार जीरा, इलायची, सौंफ और अदरक हैं जो शरीर में अपच को ठीक करते है। 

5. कैंसर, निम्न रक्तचाप, कोलेस्ट्रॉल सहित बाकि क्रिटिकल बीमारियों से बचाव:

आयुर्वेदिक उपचार कैंसर की रोकथाम के लिए भी बहुत जाने जाते हैं। शोधकर्ताओं का सुझाव है कि आयुर्वेदिक आहार और विश्राम तकनीक पट्टिका बिल्डअप को कम करने में मदद करते हैं। आयुर्वेदिक चिकित्सा जड़ी बूटियों विटामिन, खनिज और प्रोटीन की एक भीड़ प्रदान करती है। ये एक उचित खुराक में एक साथ मिश्रित होते हैं और प्रतिरक्षा संबंधी विकारों को रोकने और मुकाबला करने के लिए एक इष्टतम समय पर प्रशासित होते हैं।

चिकित्सा की इस प्राचीन कला, आयुर्वेद ने पुरातन चिकित्सा शास्त्र के अन्य रूपों जैसे तिब्बती चिकित्सा और पारंपरिक चीनी चिकित्सा को आगे बढ़ने में मदद की है। यह चिकित्सा के सबसे पुराने और प्रचलित रूपों में से एक है। इसका उपयोग यूनानियों द्वारा भी किया जाता था। माना जाता है कि हम जो भोजन करते हैं, वह हमारे सामग्रीक भलाई  पर प्रभाव डालता है, और हमें अभ्यस्त या दुर्बल बना सकता है। हम जो खाते हैं वह निर्धारित करता है के हम ऊर्जावान होंगे या सुस्त होंग।

 

आयुर्वेद का अस्तित्व western medicine से बोहोत पहले से था। आधुनिक चिकित्सा की शुरूआत ने और भारत में लगातार विदेशी आक्रमण के वजह से इस कला को महत्व नहीं मिला। वर्तमान में, आधुनिक चिकित्सक इस प्राचीन कला के महत्व को समझ रहे हैं और आधुनिक चिकित्सा विज्ञान के साथ आयुर्वेद का संबंध बनाके आयुर्वेद पर अधिक शोध लाने की भी कोशिश के जा रही है।  चिकित्सा विज्ञान में इस नई प्रगति के साथ लोगों के विचारधारा और जीवन शैली में भी बहुत तेजी से बदलाव आ रहें है।

 

रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने में कारगर है आयुर्वेद

 

आयु्र्वेद के जरिए हम अपनी रोग प्रतिरोधक क्षमता भी बढ़ा सकते हैं। रोग प्रतिरोधक क्षमता के बढ़ने से ना केवल कोरोना वायरस जैसी महामारी से खुद को बचाया जा सकता है, बल्कि कई अन्य तरह के घातक वायरस से भी बचाव होता है। बेशक हम इस वायरस से खुद को बचाने के लिए हर तरीके अपना रहे हों, लेकिन कई अध्ययनों में पता चला है कि अब ये हवा में भी मौजूद है। ऐसे में अपनी रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाकर ही हम इससे जीत सकते हैं। इसके लिए कई तरह की जड़ी बूटियां और वनस्पति हमारे काम आएंगी।

गिलोय- गिलोय आजकल दवा और जूस के रूप में उपलब्ध है। इसे पानी में उबालकर भी पिया जा सकता है। इसे दैनिक आहार में शामिल कर रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ सकती है।

आंवला- इसे करौंदा के नाम से भी जाना जाता है। आंवले की चटनी या रस का भी सेवन किया जा सकता है। यह चयवनप्राश का प्रमुख घटक है। इसमें बड़ी मात्रा में विटामिन सी (C) भी मिलता है।

तुलसी- इसके सेवन से ऊपरी और निचले श्वसनतंत्र की बीमारियां जैसे खांसी, सर्दी या श्वास संबंधित कष्ट को दूर कर सकते हैं। तुलसी के पत्तों का भी सेवन किया जा सकता है। या फिर इसे हर्बल टी के तौर पर पी सकते हैं।

हल्दी- आयुर्वेद में हल्दी को काफी गुणकारी माना जाता है। यह हमारी रसोई में सबसे ज्यादा इस्तेमाल होती है। इससे सूजन, कर्करोग, अल्जाइमर या ह्रदय रोग में मदद मिलती है। रोज खाने में डालने के अलावा हल्दी का पाउडर दूध में डालकर उसका सेवन किया जा सकता है। या फिर हल्दी की गोलियां भी खा सकते हैं।

काली मिर्च- इसे भी आयुर्वेद (Ayurveda in Hindi) में एक अहम स्थान दिया गया है। काली मिर्च को हल्दी से मिलाकर खा सकते हैं। ये सर्दी को जड़ से खत्म करने में काफी गुणकारी है। यह रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाती है और आजकल गोलियों के रूप में भी उपलब्ध है। 


 




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